Sunday, February 17, 2013

अभिव्यक्ति क्रमांक - ०५६ - सोच तेरी रूप जवानी --- पथिक अनजाना

सोच तेरी रूप जवानी का तेरी नादानी से हुआ क्या हाल
तेरी हरकतें देख-देख तेरी संतान सामने तेरे जवां हो गई
खो  सहारा भौंरें का अब क्या तू सबको मुंह दिखावेगी रे
किस मुंह से मांगे तू कृपा कृपालु के समक्ष कैसे जावेगी
मांग माफियाँ सबसे जिनके इस जग में तूने दिल दुखाये
अब बहाये तू आंसू अपनी नादानी पर पहले सबने बहाये
कर नग्न अपनी गलतियों की कब्रों को होने दे जाहिर तू
सुबह का भूला शाम घर आवे वह तो भूला न कहलावेगा
गर गया तू जाग  सितारों की ऊचाँईयों तक नाम जावेगा   
   पथिक अनजाना

यदि उदगार को रूचिकर व विचारणीय मानते हैं कृपया अग्रेषित करें

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