Thursday, March 14, 2013

अभिव्यक्ति क्रमांक ०७८ खेल शतरंज का क्या खेल हैं - पथिक अनजाना

खेल शतरंज का क्या खेल हैं खेले कोई और व मोहरे कोई और
ख्वाहिश व शिकंजा किसी का कभी आगे आढे तिरछे फेंकें जाते
सुनो अचंभा मोहरे सपने देख गीत हारजीत के लगा कान सुनते
जब हकीकत से हुआ सामना तब लगा अपने बाल नोचे इंसा हैं
कहे मोहरे क्या तुम्हारी औकात रे इंसान जो बिखेरता मुस्कान हैं
हम तो सभी चाहे राजा या प्यादा एक ही डिब्बे में समा जाते हैं
तुम लोग बाद मौत के अलग जमीन पानी आग में क्यों जाते हो
परिजनों से धोखे कर जब वक्त पीसता तो हेकडी निकलती तब
याद नही करते अपने कर्म, दोष गैरों को या खुदा को दे जाते हो
हमें भी साथी  मोहरे ही शत+ रंजी चालें दे हश्र यह दिला जाते हैं
पर बाद बारी के सभी एक स्थान में मित्र हो महफिलें सजाते हैं
हंसे पथिक अनजाना सिवा कुछ, भटके इंसा सुखी कैसे कहलातेहैं
हमें भटकाती अंगुलियाँ व यारों तुम्हारे विगत जीवन में भटकाते हैं
न लेते सीख देख गैरों को कवच स्वार्थ मोह,अंह,लोभ का चढाते हैं
खाक एक जैसी में मिलते सभी वहाँ फिर क्यों सपने यों सजाते हैं
पथिक अनजाना ( सतनाम सिंह साहनी)
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