Friday, April 12, 2013

अभिव्यक्ति क्रमांक १०८ -- भविष्य के सुखों की खातिर

भविष्य के सुखों की खातिर ए बन्दे
हर वक्त आवाम की कर मदद यार
न रहेगा नुकसान में मान बन्दे देख
वक्तपर की सेवा फल मिलेंगें अनेक
कहते फल सब्र का सदा मीठा होता
हो बेसब्रा की सेवायें को सुना रोता हैं
संभावी फल खिसक जाता हाथों से हैं
न हकदार तू चूंकि पाया फल बातों से
किया सौदा खुद हीरों बदले शान से हैं

पथिक अनजाना

No comments:

Post a Comment

on comment page