Saturday, February 16, 2013

अभिव्यक्ति क्रमांक - ०५५ - दुश्मन बेशुमार हैँ ---- पथिकअनजाना

गर मेरी जरा भी पुकार मानने
योग्य हैँ खुदा तेरे दरबार में
तो सुनें मिटायें ऐसी हस्तियाँ
जमींन से मेरे परवरदीगार जी
जहाँ नेकनीयत की न मौजूदगी
न मिलती यकीनन व्यवहार में
भले ही दुनियायी निगाहों में हो
मसीहा,पर वह आग-दलदल हैँ
शांति के ऐसे दुश्मन बेशुमार हैँ
   पथिक अनजाना

यदि उदगार को रूचिकर व विचारणीय मानते हैं कृपया अग्रेषित करें
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