Wednesday, March 20, 2013

अभिव्यक्ति क्रमांक ०८४ - कहें रहनुमां अनुसरण करो ---- पथिक अनजाना

दुनिया में विशाल जनसागर मौजूद राहों पर
निर्णय तुम्हारा हर सांस क्या यू ही सरकना
या फिर कर साहस तोडो क्रम व निकल चलो
न बदली राह, थे जहाँ तुम वहाँ कोई और हैं
तूफान आये पतझड छाये कभी हरियाली गाये
राहे बेअसर पंक्तियाँ भी बेअसर न बदले साये
याद उसी को किया जाता जो पंक्ति ठुकराता
मंजिल पाता जो मंजिल से बेपरवाह हो जाता
पूछोगे गर मंजिल कहें रहनुमां अनुसरण करो
न बतायें आकार न करें विचार मंजिल का हैं
जीवन व्यर्थ हो जाता जीवन नही दिल का हैं
कहते हैं मंजिलें तो ख्वाबों का प्रतिबिम्ब होती
जीवन राही हो पथिक न मायामोह से रूकते हैं
राही भीड में अनगिनत, याद कोई किया जाता
विचारो चाहे पूछे न तुम्हें कोई जीवन राह में हैं
संख्या अनुसरणकर्ता की बढायेगे राहखो जायेंगें
यह हमसफर व ज्ञानी सब तुम्हें यहाँ बहकायेंगें
निकल चलो अलग राह पर तब खुदा को पायेंगें
पथिक अनजाना ( सतनाम  सिंह  साहनी )


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