बुधवार, 10 अप्रैल 2013

अभिव्यक्ति क्रमांक १०६ -- निभाते मानो सपना नही

मुहब्बते नियामत जिन्दगी में होती  इक बार
नही बरसती फिर कभी जिन्दगी में कभी दुबारा
आये ही क्यों थे आप मेरे दिल के जो हुये करीब
क्यों कहते हो तुम.नाता नही हैं हमारा तुम्हारा
हाल वही हुआ अपनाते दुनिया में सब कुछ आ
हो गंभीर कहते दुनिया मे कुछ भी अपना नही
कहते जिन्दगी सपना, पर निभाते सपना नही

पथिकअनजाना

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