Tuesday, March 26, 2013

अभिव्यक्ति क्रमांक ०९० -- कब से राह करीबी हैं तेरी - पथिकअनजाना

थोडा सोच कोई  तक रहा कब से राह करीबी हैं तेरी
चाहत से व श्रम से अगर तू  बरसा दे रहमतें  उस  पर
जिन्दगी का हो गर मकसद सिर्फ  बाँटना खुशियाँ हो
देवे  मुस्कान हर राही को जुडेंगी हथेलियाँ बन्दगी  की
दौलतमन्द होता वह जो हमसफरों के दिलों में समाये
खूबसूरत होता वह हैं जो ज्ञानी नही चरित्रवान कहलाये
पथिक अनजाना  वही जो राह में न कही पर थम जाये
यह तीनों नही परवाह करे कभी जमाने की यहाँ आकर
मिलती बुराईयाँ फूल हैं घेरती गर भीड लगे मानो शूल
हाय, बाय,राय,सजाये न अपनाये यही इनका असूल हैं
पथिक अनजाना ( सतनाम सिंह साहनी)




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