Friday, February 15, 2013

अभिव्यक्ति क्रमांक - ०५४ - निराशा की जननी सदा से - पथिकअनजाना

निराशा की जननी सदा से आशा ही रही हैं
आशा के साये में से इंसान जन्म लेता  हैं
आशा में ही हर सांस व खेल यहाँ होता हैं
यह दिल आशा की परचम ले भटकता  हैं
झूठ व फरेब की बुनियाद जहाँ में आशा हैं
न झल-बल-कल ,अस्तित्वहीन आशा होगी
न हताशा होगी न बनोगे स्वप्नदृष्टा रोगी
इसआशा को कहीं दूर दफन करों तुम यारों
इसी आशा ने ही हमें बरबाद किया प्यारों  
ब्लाग --  विचार सागर मंथन
पथिक अनजाना
यदि उदगार को रूचिकर व विचारणीय मानते हैं कृपया अग्रेषित करें
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