Saturday, April 6, 2013

अभिव्यक्ति क्रमांक १०१ – दिवस नये से शांति से - पथिक अनजाना

यार मेरे जब जग में  तभी  हुआ सवेरा तुम्हारा
गर चाहत तुम्हारी शुमारी पवित्रता के समूह में हो जावे
चाहत साथ तुम्हारे विशाल शांति व सदकर्मों की पूजी हो
बिसारो इर्ष्या व्देष चालें कुचालें दूषित विचारों विकारों को
जन्ममरण चक्र से मुक्त हो कही विश्राम पाना चाहते हो
सुखद मुस्कराते निष्कलंकित रूपेण यात्रा सजाना चाहते
प्रारंभ करो प्रयास चूंकि अमिट दागों को छुडाना चाहते हो
संभवतः कुछ काल या फिर जन्म मंथनों में बीतते जावेंगें
पर एक दिन मंजिल पावोगे व शांति से मुस्कानें बिछावोगे

पथिकअनजाना

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