हर मोड आते आते मेरे जीवन की
कुछ गुथ्थियाँ जो उलझी वे सुलझी
फंस सोचविचारों में सांसें विचारों की
नई अनचाही गुथ्थियाँ उलझ ही गई
सुलझाना जब जमाने को आने लगा
ऊलझने लकीरों विचारों में आने लगी
मुड पीछे कर प्रयास देखा आगे मैंने
न प्रारंभ जाना व न अंत नजर आया
आयु ज्यों ज्यों बढती गई मेरी यहाँ
हर बात कहने को जुबां संभलती गई
सतर्क बावजूद नये जालों ने फंसाया
भुलभलैया छोडी तब पथिक कहलाया
पथिक अनजाना ( सतनाम सिंह साहनी)
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