Sunday, April 7, 2013

अभिव्यक्ति क्रमांक १०२ - गुलाबी शाम को --- पथिक अनजाना

जिन्दगी की किसी सुहानी व गुलाबी शाम को
बैठोगे जब घुटनों पर हाथ रख कर तुम कही
चोरी से आँऊगा जब तुम्हारे उलझे ख्यालों में
मुस्कानें आहें होगी काबिज, तेरे हर सवालों में
कहोगे पथिक तुम आये ही क्यों थे जमाने में
मैं अनजाना, पर माहिर तुम बनाने बहाने में
नही होते सामने याद तुम करते रहते मुझे हो
हो सवालों ख्यालों में गुम, मैं खोजू सवाल कहाँ
बना खुद हर शै को सवाल करी जिन्दगी बवाल
जिस घडी सवालों को छोडोगे लोग देंगें मिसाल

पथिक अनजाना

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