हर वक्त के सिंहासनकाबिजों ने अपने चाटुकारों से लिखाया
वास्तविकता सदैव थोडी भिन्न हैं जिसे गया सदा छुपाया हैं
मर्यादा मरी यादें लक्ष्मण रेखा मन के लक्ष्य की रेखा होतीहैं
सच्चा इतिहास बुजुर्गों की जुबान परजो लेखों में न बताते
हैं
लेखक कुछ धनपदकों नाम खातिर लिखे जो आका कह जाते
बिके सब योद्धा लेखक कथाकार इतिहासकार बने चाटुकार हैं
सो बिकता इतिहास कपोल कल्पित कथा कहानियाँ व्यापार हैं
वक्त को गर्त में दबा सब तब मनमाफिक गढते चाटुकार हैं
न कभी न खरे गुजरे शतप्रतिशत कसौटी कहलाते लेखक हैं
वर्तमान में बिकते चोरी के गीत लेखों विचारों का खुला बाजार
अन्तर पहले शासक व भाट सच्चाई छिपाते थे अब व्यापार हैं
पथिक अनजाना
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