Wednesday, April 3, 2013

अभिव्यक्ति क्रमांक ०९८ - जाने क्या बात हैं ----पथिक अनजाना

जाने क्या बात दुनिया क्या तुम सुखों की सागर हो
जाने क्या बात हैं तुम सारे ब्रम्हाण्ड में मशहूर हो
बस न समझ पाया क्यों दिल तुम पर आ गया था
खुदा की मेहर समझ योनि इंसा की मैं तो पा गया
यहाँ मौजूद सुखमयी लहरें भी, दुखमयी गागर देखी
भारी जाँच बाद जाना चुनाव खुद करता इंसा ही हैं
ज्ञानी ध्यानी पाखंडी बैचैन, कुटिल रचनाकार भी हैं
अनजाने सरल ह्रद्यी पथिकों के विचार भी यहाँ हैं
इतने सारे रंग देख पथिक को यहाँ आना भा गया
आनन्दहीन जीवन रंगों में आनन्द मुझे आ गया है
 पथिक अनजाना (सतनाम सिंह साहनी)


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