Tuesday, April 16, 2013

अभिव्यक्ति क्रमांक ११२ -– कहते बुलबुलों से

कहते बुलबुलो से बुलबुले सागर हो जावो
कहती दुनिया हमसे हममें मिल जावो
इस जिन्दगी की दशा बुलबुले सी होती
विचार बुलबुले का समझा जा सकता हैं
पर चुलबुले इंसान को नही जान सकते
जनसागर में है होता सागर से बाहर हैं
विचार रूप लेता जनसागर हालातों से हैं
पर अगर झाक देखो तो अंधी गागर हैं
पथिक अनजाना


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