Sunday, April 14, 2013

अभिव्यक्ति क्रमांक ११० -- दौलत चाहे अर्जित बेइमानी से

दौलत चाहे अर्जित बेइमानी से की गई या  कमाई से
दौलत चाहे इकठ्ठी ऋणों से हो या करीबी यारों से
झूठी शान की खातिर दौलत जायदाद बना जातेहो
न मिले शीतल सुखमयी छांव भटकते रह जाते हो
पानी शीतलता हो ठीकरे,वैभव झूठे मान बिसार दो
तुम आत्मा को न तडफाओ यात्रा उसकी संवार दो
पथिकअनजाना

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