शनिवार, 13 अप्रैल 2013

अभिव्यक्ति क्रमांक १०९ -- धक्के मारे हजारो बार

अकेले या सामने कुछ के दे गालियाँ धक्के मारे हजारो बार
तुम्हें उसी क्षण ही अपने पदमान अंहकार को कर कही दफन
क्षमा करो लगा लो गले उसे इक बार न मानें तो धूल चटावो
कसक या हिसाब न रखो बाकी, दाग छूटेंगें पवित्र हो जावोगे
न इंतजार करो प्रतिफल व कृपा का, तुम यार कभी यहाँ पर
बदले की भावना न रहे बाकी तो न षडयन्त्र रचोगे कभी तुम
न कुछ पाने सजाने हेतू न देने चुकाने हेतू यहाँ फिर आवोगे
छूटेंगी सारी उलझनें झगडे फसाद न कोई यादें रह गई बाकी
दिलोदिमाग पर सवार अनोखी खुश्बू  निर्मलता पा जावोगे
प्रकृति के हर जीवों में न्यामतें प्यार बाँटने का मिलेगा मौका
तब ईश्वर को सहर्ष तुम्हें दे सम्मान अपने पास बिठाना होगा
पथिक अनजाना


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