इंसान समझ ले तेरा बाग ही बेगाना यार
इंसान तेरा नाम ही कुछ अनजाना हैँ यार
जिनकी परवरिश हुई तेरे पसीने हाथों से
खुशहोता हैं जिनकी सुन बचपनी बातों को
हरा दिया जिनके लिये जमाने व रातों को
न बुरा सोचे उनका करते बाग में निवासहैं
पर जख्म दे वहीं शूली पर जो तेरे पास हैँ
उफ भी नही कर सकता कैसा परिहास हैं
सुकर्मों से बचा,किया सुकर्मों को निराश हैं
न हो मायूस न कर
शिकायत जमाने से
लोग दिखाये आईना जहाँ तेरा अतीत-वास हैं
पथिक अनजाना ( सतनाम सिंह साहनी)
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