Monday, March 4, 2013

अभिव्यक्ति क्रमांक - ०७१ - विधाता शुक्रगुजार हूँ तेरा --- पथिकअनजाना

विधाता शुक्रगुजार हूँ तेरा जो तूने जामा इंसा का दिया
मैँ निहार सका विचार कर सका व उसे प्यार कर सका
कितनी खूबसूरत तेरी फैली कृतियाँ कितनी अनमोल है
जी चाहता कि  जर्रे जर्रे को निहारूँ व बाहों में समा लूँ
न मौत न मोक्ष मांगू तुझसे  रहू मैं  सदैव अमर होकर
पर खडा कर तिराहे पर रह गये हम यहाँ दरबदर होकर
शैतानियत रिझाती,प्रकृति बुलाती उम्र हालातों से टकराती
बख्शा शैतान भरा दिमाग इंसा में क्यों पवित्र जमीन पर
प्रकृति की खूबसूरती में  अनचाहा ग्रहण क्यों लगा दिया

पथिक अनजाना ( सतनाम सिंह साहनी)

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