Sunday, March 3, 2013

अभिव्यक्ति क्रमांक – ०७० - दोस्तों पहचानों गर अपनी आत्मा - - पथिक अनजाना

दोस्तों पहचानों गर अपनी आत्मा
को तो उसे अपनायें व प्यार करें
बनायें उसे सारथी जीवनरथ का
निश्चित विजयश्री का श्रृंगार करो
युद्धवीर व सारथी खुद तुम हों तो
मान लीजीये कि विजय असंभवहै
दुश्मन अनेकों वार अनेकों कर रहे
आप पर निरंतर हर पल यहाँ हैं
चारों ओर से ताउम्र लडता इंसान
अस्त्रों व कोष सांस का अज्ञात हैं
रक्तबीज से बढते घटते दुश्मन हैं
उलझा अन्यत्र ध्यान वह बंटाते हैं
क्यों लादते नई गठरियाँ आप यहाँ
रखे याद यहाँ कर्म भुगतने आते हैं
पा तेरा सुव्यवहार दुश्मन खुद हट जायेगा
गर चाहते हो भला सबका तब न रहे
कभी हिसाब कल के लिये तेरा बाकी हैं
क्या पता कहानी कितनी लम्बी आपकी
चक्र से निकलने हेतू  आपको आना था
चक्रों  विकारों से बाहर आने हेतू मानें
जरूरत आपको आत्मा सारथी की हैं
पहचानें मानें सुने व जाने आत्मा को
निर्णयों में कोई शंका या भय न होगा

पथिक अनजाना ( सतनाम सिंह साहनी)

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