Sunday, March 31, 2013

अभिव्यक्ति क्रमांक ०९५ -- असहाय वृद्ध की करूण पुकार -- पथिक अनजाना

दिन प्रतिदिन रोगों के वश होता जा रहा हैँ नश्वर शरीर
जाने किसकी प्रतीक्षा में आदेश पर मैं जीवन संवारता हूँ
कर याद हर जन्म में मात्र तू  सिर्फ मेरी संगनी रही हैँ
ए जन्मों की मेरी प्रेयसी मौत आजा तुझे हीपुकारता हूँ
हर जन्म हर युग में मैने की , सदैव तेरी तो प्रतीक्षा हैँ
न देख वक्त हुआ हैँ या नही दे झोली में मुझे भिक्षा ही
मान ले असहाय वृद्ध की करूण पुकार मैँ तुझे पुकारता हूं
यारों न भयभीत रोगों से मैं हुआ चाहे बतायें कई कलायें
हैरान इंसानी दुनिया के संघर्षों से यहाँ सभी ही बेवफा हैं
देखकर के इन संघर्षों को चाहेगा कौन इस योनि में आवे
इसलिये नहीचाहता यह योनि चाहता हूँ कि मौत आ जावे
पाने को शीतलता तेरी गोद में आजा मौत तुझे पुकारता हूँ

पथिक अनजाना ( सतनाम सिंह साहनी)

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