Saturday, March 2, 2013

अभिव्यक्ति क्रमांक ०६९ - यूँ लगता हैँ इक शरीर में ---- पथिक अनजाना

यूँ लगता हैँ इक शरीर में मानो दो जिन्दगियाँ जी रहे
इक बनाई अपनी दुनिया इक जमाने के आँसू पी रहे.हैं
मैंने इंसा को इक शरीर में कितनी जिन्दगियों में देखा
देते अग्निपरीक्षा हैं हर कदम पर खींची लक्ष्मण रेखा.हैं
मध्य रेखा के फंस कर भी इंसा मोहरे अपने चलता हैं
दर्द अनेकों हैं फिर भी अंह,मोह लोभ के साथ पलता हैं
सुराहें हर घडी बुलाती फिर भी कुराह चलने मचलता हैं
सबसे अजीब,बेबस कृति कैसे सांसें जीवन में पी रहे हैं
------------------------- मानो दो जिन्दगियाँ जी रहे
पथिक अनजाना ( सतनाम सिंह साहनी)

यदि उदगार को रूचिकर व विचारणीय मानते हैं कृपया अग्रेषित करें

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