गुरुवार, 28 मार्च 2013

अभिव्यक्ति क्रमांक ०९२ - माना करती कराती सब - पथिक अनजाना

माना करती कराती सब कुछ अनदेखी शक्ति या लेखाकार हैं
वह एक निराधार अद्धैत सत्य जो कि भय व इर्ष्या से परे हैं
प्रश्न कि क्या हम उसकी सत्ता स्वीकारें या फिर अस्वीकारें
प्रभुचौकी प्रभारी अधिकारी कहते अस्वीकृति, कष्ट लावेगी
गर स्वीकृति हो उसकी सत्ता की तो विशेष कृपा हो जावेगी
फैसला करे विशेषकृपा क्या याद करके खरीदी जा सकती हैं
गर सुख सुकर्मों के आधार पर पाते तो प्रभु स्मरण बेमानी
हकीकत यह कि कर्म का फैसला प्रभु ने छोडा इंसान पर हैं
चुनना इंसान को होता हैं मर्यादा उल्लंघनकर्ता दुख पाते हैं
कुलमिला पाया सांस हर के साथ परीक्षा से गुजरना होता हैं
शायद इसीलिये हर जीव यहाँ पूर्ण विराम पाने हेतू रोता हैं
लम्बी परीक्षा के दौरानपूर्ण या अर्ध के लिये कर्मबीज बोता
फिर क्यों सजा से बचने हेतू चाटुकारिता की राह पर सोताहै
कहते कुछ चलो दोनों राह अजीब चित भी मेरा पट भी मेरा
जीवन की अनेकों समस्याओं साथ पूर्वजों का दिया बखेडा हैं
दोराहे पर न गुजारें वक्त चलें सुपथ, सोचें विषय जो छोडा हैं
-------- पथिक  अनजाना (सतनाम सिंह साहनी)

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