न समझ आती इंसा को तेरी
हरकतें
कोसते हुये क्यों बिताते हर क्षण वह
कैसा खेल रचता तू हैं तेरे मोहरे बने
हम व दास भी तेरे ही हैं ए मेरे खुदा
करे मजबूर खेलने को स्वहित के लिये
यही निर्णय बन जाते गले की फांस हैं
फैसले कर देता
खुदा हमें किस
राह से
कैसे व कब गुजारेगा,
खेल गये दास हैं
पथिक अनजाना ( सतनाम
सिंह साहनी)
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