Wednesday, March 27, 2013

अभिव्यक्ति क्रमांक ०९१ - न समझ आती ---- पथिक अनजाना

समझ आती इंसा को तेरी हरकतें
कोसते हुये क्यों बिताते हर क्षण वह
कैसा खेल रचता तू हैं तेरे मोहरे बने
हम दास भी तेरे ही हैं ए मेरे खुदा
करे मजबूर खेलने को स्वहित के लिये
यही निर्णय बन जाते गले की फांस हैं
फैसले कर देता खुदा हमें किस राह से
कैसे व कब गुजारेगा, खेल गये दास हैं
पथिक अनजाना ( सतनाम  सिंह  साहनी)


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