Sunday, March 24, 2013

अभिव्यक्ति क्रमांक ०८८ - रहम कर दो ---- पथिकअनजाना

रहम कर दो मुझ पर  मेरे मेहरबान खुदा
न ले जा बुलन्दी तक मेरा नन्हाँ आशियाँ
गर यारों ने सबूत बेवफाई का दिया कभी
बत्तर जिन्दगी व मौत का होगा वोह समां
बसने न आये जमीन पर बसते दिलों मैं हैं
रोने की चाह नही रोता देखना नही चाहतेहैं
मुस्कराये हर राही दरखास खुदा से मांगतेहैं
पथिक अनजाना(सतनाम सिंह साहनी)


No comments:

Post a Comment

on comment page