न उनकी यादें बची हैं न मेरी आँखों में कोई सपने बचे हैं
न वह बातें बची हैँ न ही कहने को अब कोई अपने बचे हैँ
सब कुछ होता जा रहा गैर, फिर हम क्यों शरीर ढो रहे हैँ
हुआ बैर किस्मत से न जाने किसकी यहाँ बाँट जोह रहे है
खुदा की मेहर हम पर,विचारों की खेती हम यहाँ बो रहे हैं
न बन्दगी सही,उनकी यादों बातों में वक्त तो न खो रहे हैं
पथिक अनजाना ( सतनाम सिंह साहनी)
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