मंगलवार, 12 मार्च 2013

अभिव्यक्ति क्रमांक ०७६ - जनसाधारण की इज्जत मान — पथिकअनजाना

यहाँ जनसाधारण की इज्जत मान
धन ध्यान व ज्ञान  लूटा जाता है
राह सही दिखाने के लिये मात्र एक
सहारा बुद्धिजीवी वर्ग ही तो होता है
पर कर चापलूसी लोग आत्मा विरूद्ध
लिख लेख लाश आत्मा की  ढोते है
सुखद बना यह जीवन खुद का बेचारे
नागरिक ज्ञान, कानून को देख रोते है
कार्य में व्यापार यह लूटते स्वप्नों को
और सरकारें देती बोझिल कर भार है
झूठी सामाजिक मान कसौटी खातिर
अनदेखे खुदा को यह बनाकर हथियार
समुदायी नेता अपनी रोटियाँ बोटियाँ
सेकते कहलाते जाने क्यों धर्मनेता हैं
ये स्वामी इंसानी सांसों के बन जाते
चूंकि इंसा का दिमाग हुआ बेकार है
आश्रितों के कर्ज व दायित्वों के मर्ज
अर्ज व हर्ज का देनदार यह इंसान है
निर्भिक व स्वस्थ मनोमष्तिक से
मानवीय दुर्गति पर विचार कीजिये
कैसे अपने भाई कहलाते जो नोच
रहे इंसान तुझको धन्य व पूज्य तू
सामाजिक बंधनों में अनदेखी शक्ति
के भय से ताउम्र सोया व खोया है
अब कर जमींदोज झूठे रहनुमाऔ
को बदल कानून तोड दे बेडियो को
न बन लकीर का पथगामी चलउठ
क्यों नही खोजता खुद नई राहों को

पथिक अनजाना ( सतनाम सिंह साहनी)

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