ए
कविता किस मोहजाल में फंसाया हैं
दिन
गुजारते थिरकाते रहते ये अंगुलियाँ
रात
नींद चुराती तुम सदा मेरी आँखों से
कशमकश
भगाती है नींद हर सुबह को
हार
कर बिखरे पन्नों को रहे समेटते हम
बाट
किस्मत की जोहते कभी सो लेते हैँ
कहते
लोग क्या तुम कविता से पाते हो
जवाब
मेरा की गर मुहब्बत तुमने कभी
मेरे
सामने प्रश्नकर्ता न बन पाते अभी
नही
देखती मुहब्बत रूप आकार विचार
दीवाना
कविता का मैं खोये होश व यार
पथिक अनजाना (
सतनाम सिंह साहनी)
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