मैं कुदरत में जिधर देखूँ उधर
पाऊँ करिश्मा
तेरा बेमिसाल हैँ
जमींन को देखूँ आसमाँ देखूँ
सागर देखूँ
अजबसबका हाल हैँ
इंसानों को देखूँ
जीव जन्तु देखूँ
बनावट सबकी पर
दिल निहाल
पक्षीरंगीले उडते
देखूँ गूंजती हुई
मधुर आवाजें
सुनूँ क्याकमाल हैँ
जल की गहराईयाँ कैसे
मैं देखूँ
कन्दरायें
पर्वतों को दूर से देखूँ
न समझ सका कुदरत
को दिल
माना यह कि कुदरत बेमिसाल
प्यार में मग्न
देखूँ कहीं मैं
तैयारी जंग तो
कही मचलते
चीखते तूफान व
लहरें देखूँ
चालें पर्दों के
पीछे से चलते
अपने देखूं सब
अनोखाहालहैँ
ऊँगता सूर्य
देखूँ डूबते सितारे
शीतल चन्द्र की
क्या चाल हैँ
मौसमी आवाजाही
देखूँ हवाओं
की भागमभाग चकित
हो देखूँ
शायद नही
ब्रम्हाण्ड में अन्यत्र
मिलेगी अनोखी ऐसी
मिसालहैँ
परवरदीगार के
खजाने से इंसा
बरसती नियामतों
से मालामालहैँ
वाकई कुदरत जिधर
देखूँ कही
देखूँ तेरा
करिश्मा लाजवाब हैँ
खोजे तू शांति हैं
रे इंसान कर
शांत मन जिसका
बुरा हाल हैं
ब्लाग -- विचार सागर मंथन
पथिक अनजाना
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