सोचिये बाँटा तुमने खुद को कितने जहान में रे इंसान
खूबसूरत दिल हैँ
तुम्हारा जबकि मालिक कोई और हैँ
दिखाते चाहत किसी
को दिल में रहे बात कुछ और हैँ
किया फैसला किसी
प्रभाव में आ बताते कुछ और हो
नाम,कामकुछ रखते
धोखे में खुद को होते कुछ औरहो
दुनिया,समाज,परिवार
के ही नही अपने से भी चोर हो
हर बात उल्ट न
औकात पर फैलाते भूमि पर शोर हो
रहस्य नही जाने
वो निर्माता भी तुम बनते सिरमोर हो
ब्लाग - विचार सागर मंथन
पथिक अनजाना
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