मुझे यकीन आ गया
अब बात
सच धुरी में बसता
वो खुदा हैं
जब कोई डूब जाता
होता मस्त
वीणा की मधुर
झंकारों में कभी
जब कोई डूब जाता
तहेदिल से
कहीं निस्वार्थ
सेवा बेआसरों की
जब कोई डूबता हैं कुछ
दिलों पर
चोटिल गहन धुनों
के निर्माण में
जब कोई डूबता कामुक
हसीना के
उलझता सौंदर्य के नशीले नशे में
जब कोई डूब जाता दूर
विचारों के
पन्नों के खजाने को कही सजाने में
गहरी शांत में
मतवाले जीवन वाले
खुश्बूदार सांसें
ले हंसके गुजारते है
यह डूबना जानलेवा
नही होता यह
मस्त होने के
लिये हमें पुकारते हैं
हाथ जोड विनती
करता प्रकृति से
यह याञा न कभी
भंग न रूके कही
यही है वह धुर की
वाणी संसार में
पसारती धुर के
प्यारे सुविचार हैं
ब्लाग -- विचार सागर मंथन
पथिक अनजाना
No comments:
Post a Comment
on comment page