निभाने आये
थे फर्ज अपना
उतारने आये है कर्ज अपना
फ़र्ज कर्ज की भंवर में फंस
नादां दिल मुहब्बत कर बैठा
मुहब्बततो
मुहब्बत कहलावेगी
दुनिया वाले पागल,प्रेमी
व
कवि में अन्तर न जान
सके
कैसे निकले हम कुंऐ
की भंवर
से किस खाई में दिल
लगाये
जो मुहब्बत न कभी
कहलाये
भक्ति, शक्ति से
वास्ता नही
पथिक रहे मिला
रास्ता नही
ब्लाग -- विचार सागर मंथन
पथिक अनजाना
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