Thursday, February 7, 2013

अभिव्यक्ति क्रमांक - ०४६ - निभाने आये थे फर्ज अपना -- पथिक अनजाना

निभाने आये थे फर्ज अपना
उतारने आये है कर्ज अपना
फ़र्ज कर्ज की भंवर में फंस
नादां दिल मुहब्बत कर बैठा
मुहब्बततो मुहब्बत कहलावेगी
दुनिया वाले पागल,प्रेमी व
कवि में अन्तर न जान सके
कैसे निकले हम कुंऐ की भंवर
से किस खाई में दिल लगाये
जो मुहब्बत न कभी कहलाये
भक्ति, शक्ति से वास्ता नही
पथिक रहे मिला रास्ता नही
ब्लाग --  विचार सागर मंथन

पथिक अनजाना

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