मंगलवार, 5 फ़रवरी 2013

अभिव्यक्ति क्रमांक ०४४ - उदघोषक हो या रचियता वही – पथिक अनजाना

उदघोषक हो या रचियता वही बोलना
चाहता जो पसन्द दुनिया की हो
निर्भर करें उदघोषक की अदायें व
आवाज की लय ज्ञानबह शक्तिसह
निर्भर करे रचियता के विचारसंसार
शब्दों की माला से माला वह पाता
चाहत यही खुदा की कि इंसा सदैव
कर्मों पर कर ले केन्द्रित कान ध्यान
पर बेचारा मनुष्य यहाँ तोजगत की 
आडम्बरमयी माया का दीवाना हुआहैं
ब्लाग --  विचार सागर मंथन

पथिक अनजाना

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