मंगलवार, 26 फ़रवरी 2013

अभिव्यक्ति क्रमांक - ०६५ - किसके लिये इतने ----- पथिक अनजाना

किसके लिये इतने मशगूल रहते हो मेरे मित्र
बेइन्तहा धन कमाकर संग्रहित करने के लिये
गर औलाद को समीपता मार्गदर्शन दे सके
प्यार से किया मरहूम तो क्या तुम सुख पावोगे
हाथों से छूटेगी जब औलाद ,जीवन व्यर्थ माने
उस घडी तुम धन से क्या औलाद खरीद लावोगे
तडफे चीखेगा दिल तुम्हारा क्या धनी कहलावोगे
धन नही जरूरी उचित मार्गदर्शन जरूरी होता हैं
गर न मिला तुम्हें तो क्या अनुभवों से न सीखे
तुम्हारी अंध-मूक-बधिरता औलाद प्रमाणित करे
जीवित रहे तुम, न कि आत्मिक लाश ढोते फिरे
पथिक अनजाना ( सतनाम सिंह साहनी)
यदि उदगार को रूचिकर व विचारणीय मानते हैं कृपया अग्रेषित करें

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

on comment page