सोमवार, 25 फ़रवरी 2013

अभिव्यक्ति क्रमांक -- ०६४ - जिन्दगी की कहानी को हमने पथिक अनजाना

जिन्दगी की कहानी को हमने एक खुली किताब बना दिया
जाने पढें जाँचें परखें तौले तर्क विचार पक्षविपक्ष में करे
कर खुद को नग्न हमने यहाँ लेखो शब्दों से उजागर किया
सोचा कर साफ आत्मिक पात्र को कुछ  सारगर्भित भर लेंगें
ख्याल नही कुछ समाने का चूंकि पात्र साथ हम भी खो गये
खेल जिन्दगी का शतरंजी ,छिपे वार सीने में दफन हो गये
फतह हासिल हर गैर पर, विजयश्री समक्ष परिवार खो गये
किस्मत हालातों ने मुझे धनहीन शक्तिहीन कर ही दिया
डूबता सूर्य देखना कौन चाहे तन्हा हमने खुद को कर लिया
हंसने की इच्छा नही दिलदिमाग को नयी शराब से भर लिया
राह मेरी चलना आप,न पहचाना खुद को पर दीवाना हुआ
पथिक अनजाना ( सतनाम सिंह साहनी)
यदि उदगार को रूचिकर व विचारणीय मानते हैं कृपया अग्रेषित करें

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