Wednesday, February 27, 2013

अभिव्यक्ति क्रमांक ०६६ - अन्तत: कसौटी पर - पथिक अनजाना

अन्ततः कसौटी पर आकर सत्य परखा ही गया
जान लिया मैंने अब सत्य जो महापुरूषों ने कहा
योगी वही वस्तुतः जो दुनिया को सम कर जाने
न कभी अपनों, न सपनों को कभी जीवन माने
हंसता रहा दिल में, बैठ अकेले मै खूब हंसता हूं
कह गये बेचारे अपने अनुभव व टंगे दीवालों पर
देखा हश्र ,विचारों की मजारों के खादिम बन गये
ग्रन्थ बिकते बाजारों फिर कबाड में तौले जाते हैं
न अपनाये विचार,अमुक के अनुयायी कहलाते है
पथिक अनजाना ( सतनाम सिंह साहनी)

यदि उदगार को रूचिकर व विचारणीय मानते हैं कृपया अग्रेषित करें

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