नही
आजाद
रहा
हैं
कभी कोई
इंसान किसी भी जमाने में
भूसत्ता के गलियारों में या खोये मजबूरियों
के बाजारों में
पर झुकना तो पडता हैं चाहे शक्ति हो किन्हीं गवाँरों में
दर कहीं खुदा का दर नातों का सबब होवे गुजरी बातों का
गुमराह कर देती गोरी लाते या सपनों में धन की बरसातें
बंधी बेडियाँ मोहपाशोंकी
छाई बदबू इंसानी ख्वाबीलाशों की
गुलाम बन जन्मा गुलाम वह रहा गुलामी में मरेगा इंसान
निकल शीघ्र मायावी जालों से वर्ना कीमत कई जन्मों भरेगा
पथिक अनजाना ( सतनाम सिंह साहनी)
यदि उदगार को रूचिकर व विचारणीय मानते हैं कृपया अग्रेषित
करें
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