Saturday, February 23, 2013

अभिव्यक्ति क्रमांक ०६२ --- क्या खूब कहा जहाँ चल रहा ---- पथिकअनजाना

क्या खूब कहा जहाँ चल रहा था राह अपनी
बाद भी चलेगा चलता रहेगा ये राह अपनी
गर हैं हिम्मततो उठ राह मोड दे जहाँ की तू
औकात तो शांत हो जा कर किनारे बैठ तू
बने तो बन भारी बम , कि दुनिया थर्रा जावे
फुलझडी बन पथिक क्षणिक राह तो पाजावेगा
या समझाले दुनिया को कि राह तेरी वह आवे
जीतेजी न कीमत बाद में दुनिया लजा जावेगी
बेघर हो तुम,तुम्हारे विचार नगर बसा जावेगी
चिरागबुझा तो क्या चिरागमाला जला जावेगी
पथिक अनजाना ( सतनाम सिंह साहनी)
यदि उदगार को रूचिकर व विचारणीय मानते हैं कृपया अग्रेषित करें

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