क्या खूब कहा जहाँ
चल रहा था राह अपनी
बाद भी चलेगा व चलता रहेगा ये राह अपनी
गर हैं हिम्मततो उठ राह मोड दे जहाँ की तू
न औकात तो शांत हो जा कर किनारे बैठ तू
बने तो बन भारी बम , कि दुनिया थर्रा जावे
फुलझडी बन पथिक क्षणिक राह तो पाजावेगा
या समझाले दुनिया को कि राह तेरी वह आवे
जीतेजी न कीमत बाद में दुनिया लजा जावेगी
बेघर हो तुम,तुम्हारे विचार नगर बसा जावेगी
चिरागबुझा तो क्या चिरागमाला जला जावेगी
पथिक अनजाना ( सतनाम सिंह साहनी)
यदि उदगार को रूचिकर व विचारणीय मानते हैं कृपया अग्रेषित
करें
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