Friday, February 22, 2013

अभिव्यक्ति क्रमांक - ०६१ - किससे पूंछें जाकर ---- पथिकअनजाना

किससे पूंछें जाकर क्या मैं राह भटक गया हू
न जानू मैं कोई सही पथप्रदर्शक या हमसफर
दोराहा पीछे छूटा इक सुकर्म दूजी अंधी भक्ति
मेरी आत्मा ने अंधा भक्त होना अस्वीकारा हैं
बची राह कहलावे सुकर्म की चल पडा मतवारा
कहे ज्ञानी यहाँ भक्ति व सुकर्म राहों को जोडूं
जब मौजूद सुगम राह क्यों भ्रम को न मैं तोडू
कहते वह भक्ति महान जो करावे सुकर्म यार रे
पाया सुकर्म महान जो फलितः स्वंय हो जाता हैं
क्यों राह भक्ति की चुनें राह सीधी मौजूद पाते हैं
सुकर्म इंसानी आत्मिक का आदर्श एकमात्र सबूत
शेष नही कोई शक या शुबहा किसी राह का मुझे
किया फैसला न भटकूं अब कभी राहें विभिन्न पर
पाई राह सच्ची अब न विधि न ज्ञान चाहिये
पथिक अनजाना ( सतनाम सिंह साहनी)
यदि उदगार को रूचिकर व विचारणीय मानते हैं कृपया अग्रेषित करें

RESPONSE ON – 21thcent.vichar@gmail.com

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