महफिलें सजाने के लिये कभी भी हमें यार न मिले
दरबार जाने के लिये हमें कोई सिपहसिलार न मिले
बदनाम यारों की नजर हम पर पहले से यहाँ हो गई
सँवारते जीवन रहे ताउम्र राहें, पर सांसें व्यर्थ हो गई
पथिक बन आये राह भूली मायावी नगरी में सो गये
न आत्मिक पुकारें सुनी
अब आवाज अपनी खो गये
पथिक अनजाना ( सतनाम सिंह साहनी)
यदि उदगार को
रूचिकर व विचारणीय मानते हैं कृपया अग्रेषित करें
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