सुनी गर्जनायें तकरीरों की व घूमती लकीरें तस्वीरों की
देखे उतार चढाव तखदीरों के देखी भावनायें वसीलों की
देखे बाजार यहाँ जमीरों के छटपटाहटें
देखी अधीरों की
कराहती थापें मजीरों की आहटें शीतयुद्ध बीच वजीरों की
जाने किस दम पर अपने अपने ढोल बेदर्दी से पीटते हैं
जाने क्यों दोहराते कहानियाँ घिसेपिटे नतीजे घसीटते है
आंखेंकान ह्थेलियों में छिपाता में,क्यों
गिद्ध कौऐ खीझते
कितनी शांत प्रकृति सुहाना
सफर सुन्दर
जमीं खुश्बू यहाँ
नही दोष किसी गैर का कहें, सारा दोष हमारा ही तो हैं
गर श्रोता व दर्शक न हो तो यह मुखौटे क्यों लगावे इंसा
खोजते हल न निकलेगा ये गर्जने वाले बादल नाम के हैं
पथिक अनजाना
ब्लाग -- विचार सागर मंथन
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