मंगलवार, 12 फ़रवरी 2013

अभिव्यक्ति क्रमांक – ०५१ - खुदगर्जी का सबूत --- पथिक अनजाना

कर कवयाद दिलोदिमाग से पा जाने को सारे ख्वाबों को
बेताब पाने को मनमर्जी की फसल हैँ यहाँ पर हर शख्स
कर दर किनार खुदा को इंसा ने खुदगर्जी का सबूत दिया
छीना सकून ली आहें गरीबों की खुद ही बेनकाब हो गया
जाना इतिहास से कर ऐसे व्यवहार से सकून वह खोताहैं
हंसी आती मूर्ख जाने क्यों फिर वही गलतियाँ दोहराता हैं
समझाना पथ्थरों से सिर टकराना पथ्थरों में राह खोजता
कर्म न विचारता जाप से विजयात्रा निश्चित ही मानता हैं
सुकर्म न बोता पनपा अनन्त मरूस्थल की धूल छानता हैं
जन्मों न छान पावेगा ज्ञान बांटता पर ज्ञानी न कहलायेगा
पथिक  अनजाना

ब्लाग --  विचार सागर मंथन

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