पढ कर आप लोग मेरे कलमें दीवान को
बन्दे रहकर तन्हा बेकाम होकर उम्र सारी
मात्र ख्यालों सवालों में यूं घूमते रहे हो
न किसी काम आये न बन्दगी के गाये
न किसी बुत के दिल में थी जगह बनाई
न मंजिल खोजी न महफिल कही सजाई
याद क्यों करोगे किसी को अनजाने तुम
यह सबसे अनजान, जग इससे अनजान
राहें अनजान कदम
खुद से भी अनजान
मंजिल अनजान विचार छाये रहे अनजान
हंसोगे खूब हंसोगे तुम अपनी महफिलों में
राहतों के बीच रह भी राहत प्यारी न हुई
ब्लाग -- विचार सागर मंथन
पथिक अनजाना
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