सदगुणों
की पूंजी से ही सदैव
तुम मित्र जमाने के क्रेता बनो
न कभी
ज्ञान-मान को विक्रयहो
व्यवसायी
न विक्रेता अपने बनो
यारों तुम जमाने को गर
प्यार
करोगे तो जमाना कदम चूमेगा
अगर जमाने पर एतबार किया
तो जमाना तुम्हें सदैव फूंकैगा
जमाने को जाहिरा करो प्यार
करना परन्तु एतबार न करना
हर शै का हकदार जमाना होता
जमाने पर तुम्हारा हक न होता
पथिक अनजाना
ब्लाग -- विचार सागर मंथन
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