मंगलवार, 1 जनवरी 2013

अभिव्यक्ति क्रमांक ००९ -क्यों गढते पथ्थर की मूर्तियॉ---पथिक अनजाना 01/01



क्यों गढते पथ्थर की मूर्तियॉ
न गढते यहॉ दिलों को तुम कभी
क्यों पढते हो कागजों की पोथियॉ
नहीं पढते यहॉ दिलों को कभी
क्यों चढते भडकाऊ वचनों की
सीढियाँ नही घुसते दिलों में अभी
क्यों सडाते जीवन को बंधनों में
न सडाते गंदे विचारों को कही
न खोवो अपनी अमोल आंसें व
सांसें इन बर्बाद गलियों में तुम
करते नेता आडंबर देशप्रेम का
कोई उपासक हैं ईश्वर धन का
सारे लोभी भ्रष्ट गंदे विचार
व्यवहार इनके तन मन स्वर्णमंडित हैं
बनो न मीदास मौत को न लावो
करीब तुम पास इनके जीवन गर्त हैं
छोडो ये घिनौनी हरकतें खुश्बूमयी
बाग में चैनबंसी बजावो तुम
पथिकअनजाना
ब्लाग --  विचार सागर मंथन 

-    सतनाम सिंह साहनी     (पथिक  अनजाना ) 

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