Thursday, January 3, 2013

अभिव्यक्ति क्रमांक ०११ -- - बेशकीमती हैँ -- सतनाम सिंह साहनी ---पथिक अनजाना 03/01

मौजूदगी तुम्हारी इस बाजार में किसलिये हैं ?
तुम क्या कुछ खरीद पाते या खरीदे जाते हो
बेशकीमती होते वे जो कीमती गैरों को बनाते हैं
बेकीमती जो स्वंयभू कीमत खुद की लगाते हैं
हीरा छोटा कांच टुकडा पर ताज कीमती बनाता
हीरे का  वैसा टुकडा इंसानी जीवन मिटाता हैं
किस्मत हीरे की वह क्या गुल यहाँ खिलाता हैं
अनेकों को कीमती बनावोगे तो ताज कहलावोगे
स्वंयभू हीरा कहोगे मुंह मिंया मिठ्ठू मान पावोगे
हमसफर बहुतेरे पथिक अनजाना न बन पावोगे
क्षमता हैं आदर्श बनने की या गैरों को बनावोगे
सतनाम सिंह साहनी (पथिकअनजाना)
ब्लाग – विचार सागर मंथन

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