सब कुछ पा लेना चाहते हैं
जानते साथ न कुछ जावेगा
जानते सुकर्म धनी बनावेगा
जानो रवि–छाया में सब छवि
फिर बिन विचारे जग में हम
सब समेट लेने को चाहते हैं
अत: बिन विचारे प्राप्ति न करे
विचारने से पूर्व हम कोई वस्तु
सेवा व प्यार को कभी न त्यागें
ब्लाग – विचार सागर मंथन
पथिक अनजाना
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