कहते हैं इंसान ध्यान लगावो
योगबनावो तब ही कुछ पावो
मै कहता इस जग में न कौन
जुटा ध्यान योग बनाने में हैं
सब प्रतीक्षारत हर अगले पल
कुछ ओर या इसके बाद क्या
ध्यान होता बातों में चकाचौंध
की दुनिया व ख्यालों चालों में
ध्यान किसी का लगा पद व मान
में व कोई बैठा ध्यान में ले
जाने
ध्यान में कोई लगा किसी इंसा को
मनाने में व कुछ और पा जाने में
कोई ऐसा जग में जो हर पल रखे
ध्यान पर मग्न नही है वह बैठा
ध्यान खुदा का भी अपने खिलौंने
के खेलों में रचनाऔ में रहता हैं
ध्यान सबका लक्ष्य पाने की योग
तो जुगत विधि सोचे ध्यान में है
कहा यह जावे कि ध्यान व योग
भोग कही दूर इक राह मिलते है
तिराहा न मिला कभी व राह से
जग से रहा पथिक अनजाना हैं
ब्लाग -- विचार
सागर मंथन
पथिक अनजाना (सतनाम सिंह साहनी )
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