Saturday, January 26, 2013

अभिव्यक्ति क्रमांक -- ०३४ --- प्रतीक्षा में रहते थे ---- सतनाम सिंह साहनी

प्रतीक्षा में रहते जिन्दगी के हर भावी पल की
सोचा हमने कभी कुछ कर सकेंगें या करेंगें
झांकते अतीत में खोजते भविष्य बसे कल को
रहे गफलत में जो किया या कर रहें भरेंगें
दांवपैंचों में गवांया जन्म सोचा न कैसे करेंगें
बोझ सोच पल्ले बांधी दबे भार से कहाँ चलेंगे
प्रतीक्षा भिक्षाशिक्षा खोई क्यों लोग याद करेंगें
ब्लाग --  विचार सागर मंथन
पथिक अनजाना (सतनाम सिंह साहनी 

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