प्रतीक्षा में रहते जिन्दगी के हर भावी पल की
न सोचा हमने कभी कुछ कर सकेंगें या करेंगें
झांकते अतीत में खोजते
भविष्य बसे कल को
रहे गफलत में जो किया या कर रहें न भरेंगें
दांवपैंचों में गवांया जन्म सोचा न कैसे करेंगें
बोझ सोच पल्ले बांधी दबे भार से कहाँ चलेंगे
प्रतीक्षा भिक्षाशिक्षा खोई क्यों लोग याद करेंगें
ब्लाग -- विचार
सागर मंथन
पथिक अनजाना (सतनाम सिंह साहनी
No comments:
Post a Comment
on comment page