ए तकदीर मुझे नही कोई शिकायत हैं
जैसी गुजरी जहाँ गुजरी खुदा की खैर
थी
शिकायत तो मुझे बस इस जमाने से है
भीड का हिस्सा ग्रन्थ पूजनीय बनाता
हैं
वही लूटता किसी को न जाने क्या बैर
हैं
माना कमाल की दुनिया इंसानी शहर
हैं
प्यारी नजर बनती तुरन्त क्यों
कहर हैं
राह से हम गुजर जायें वक्त की मेहर
हैं
बदलना इंसान का कर्मों की हिदायत
हैं
------नही कोई शिकायत हैं---------
क्या आपको कोई शिकायत है?
ब्लाग -- विचार
सागर मंथन
पथिक अनजाना (सतनाम सिंह साहनी )
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