Thursday, January 17, 2013

अभिव्यक्ति क्रमांक -- ०२५ --- पहचानेंगा कब ए इंसान तू — पथिक अनजाना

पहचानेंगा कब ए इंसान तू
खुदा ने ढेरो नियामतें बख्शी हैँ
हर नियामत तेरी जिन्दगी की
सच्चाई में यह लौ खुशी की हैँ
पहचान ले अपनी राह वर्ना ढेरों
शामतें तेरी राह में आ खडी हैँ
न पहचानी राह व न्यामतें गर
तूने यही से की खुदा से दूरी हैँ
ब्लाग --  विचार सागर मंथन

सतनाम सिंह साहनी (पथिकअनजाना)

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